घोडों-की-ग्लैंडर्स-बीमारी-से-इंसान-को-खतरा-:-डॉ.-त्रिपाठी

नई दिल्ली, 31 जनवरी (आईएएनएस)। घोड़ों में पाई जानेवाली ग्लैंडर्स की बीमारी से इंसान को हमेशा खतरा बना रहता है, यही कारण है कि भारत सरकार ने अगले पांच साल में देश में इसका खात्मा करने का लक्ष्य रखा है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के नए उपमहानिदेशक (पशुविज्ञान) डॉ. बी.एन. त्रिपाठी ने कहा कि ग्लैंडर्स काफी खतरनाक बीमारी है और इससे इंसान को हमेशा खतरा बना रहता है, इसलिए इंसान पर इसके प्रभावों को लेकर देश में लगातार जांच व निगरानी की जाती है। उन्होंने बताया कि जब किसी घोड़े में इस बीमारी के लक्षण पाए जाते हैं तो अश्वपालक के परिवार के सदस्यों के भी सैंपल लिए जाते हैं जिनकी जांच की जाती है।

उन्होंने कहा, यह नहीं कह सकते हैं कि भारत में मानव पर इस बीमारी का प्रभाव नहीं पड़ सकता है, हालांकि पुष्टि अभी तक इसकी नहीं हुई है, लेकिन प्रभाव पड़ सकता है।

डॉ. त्रिपाठी ने आईएएनएस को बताया कि घोड़े, खच्चर और गधों में पाई जानेवाली ग्लैंडर्स की बीमारी का उन्मूलन अगले पांच साल में करने का लक्ष्य है और इसके लिए केंद्रीय पशुपालन मंत्रालय ने नेशनल ग्लैंडर्स एरेडिकेशन प्रोग्राम चलाया है।

उन्होंने बताया कि भारत में घोड़ों में ग्लैंडर्स की बीमारी का पहला मामला 1881 में सामने आया था और यह देश में पुशओं की पहली बीमारी थी जिसके भयानक खतरे को देखते हुए संसद में 1899 में संसद में कानून पास हुआ था।

हाल ही में, हरियाणा के हिसार में पांच घोड़ियों में ग्लैंडर्स की बीमारी के लक्षण पाए गए, जिनकी जांच के लिए नमूने डॉ. त्रिपाठी के नेतृत्व में ही वैज्ञानिकों की टीम ने एकत्र की थी और पांचों नमूने ग्लैंडर्स की बीमारी के लिए पॉजीटिव पाए गए।

डॉ. त्रिपाठी इससे पहले हिसार स्थित राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र (एनआरसीई) के निदेशक थे, जो आईसीएआर के अंतर्गत आता है। आईसीएआर के नए उपमहानिदेशक (पशुविज्ञान) के रूप में कार्यभार संभालने के बाद गुरुवार को आईएएनएस से खास बातचीत में डॉ. त्रिपाठी ने कहा, इस बीमारी का खात्मा करने के लिए एक ही की तरीका है कि परीक्षण करने के बाद जिन पशुओं में ग्लैंडर्स की बीमारी के लक्षण पाए जाते हैं उनको मार दिया जाता है। ऐसा ही करके अमेरिका, यूरोप कनाडा जैसे बहुत से देशों में इस बीमारी का खत्म किया जा चुका है, लेकिन अभी भी एशिया, दक्षिण अमेरिकी और अफ्रीकी देशों यह बीमारी माजूद है। भारत भी उसी में शामिल है।

उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश 2014 में घोड़ों में पाई जाने वाली ग्लैंडर्स बीमारी का हॉट स्पॉट था जहां से अब दक्षिण भारत में भी इसका प्रसार हो चुका है। इसके अलावा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड भी में कई जगहों पर घोड़ों में इसके लक्षण मिलते हैं।

उन्होंने बताया कि 2006 में घोड़ों में ग्लैंडर्स की बीमारी कई राज्यों में फैल गई, जिनमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश शामिल थे, जिसके बाद इसका परीक्षण शुरू हुआ।

ग्लैंडर्स एक संक्रामक रोग है, जिसमें बीमारी के जीवाणु पशुओं के शरीर में फैल जाते हैं जिससे उनके शरीर में गांठें पड़ जाती हैं, मुंह से खून निकलने लगता और सांस संबंधी तकलीफें भी बढ़ जाती है।

उन्होंने बताया कि इस बीमारी का पता एलाइजा और कॉम्लीमेंट फिक्सेशन (सीएफटी) परीक्षण के जरिए लगाया जाता है। इस कार्यक्रम के जरिए अगले पांच साल में देश में ग्लैंडर्स रोग का उन्मूलन करने का लक्ष्य रखा गया है।

डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि बीमारी से संक्रमित घोड़ों को मारने के लिए सरकार की ओर से पशुपालक को अब 25,000 रुपये प्रति घोड़ा दिया जाता है। वहीं, खच्चर और गधे के लिए 16,000 रुपये प्रति पशु का मुआवजा दिया जाता है। पहले उनको मुआवजे के तौर पर सिर्फ 50 रुपये दी जाती थी।

–आईएएनएस