Pandit Dayanand Shastri
Pandit Dayanand Shastri Ujjain.

स्वर कोकिला और भारत रत्न लता मंगेशकर ( lata Mangeshkar )की जन्मकुंडली पर पंडित दयानंद शास्त्री की चर्चा।

ऐसी हैं भारत रत्न ओर स्वर कोकिला लता मंगेशकर की जन्म कुंडली

ज्योतिष: लता मंगेशकर की जन्म कुंडली का जीवन पर प्रभाव 1
Lata Mangeshkar Lagna Kundli
ज्योतिष: लता मंगेशकर की जन्म कुंडली का जीवन पर प्रभाव 2

सुश्री लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को रात 9 बजकर 50 मिनट में इंदौर में वृषभ लग्न, वृषभ नवांश, कर्क राशि, शनि के पुष्य नक्षत्र, सिद्ध योग में हुआ। आपके जन्म लग्न में एकादश भाव (आय) का स्वामी अष्टमेश होकर बैठा है। अतः स्वप्रयत्नों से आय के साधन मिलते है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि लता जी का जन्म आश्लेषा नक्षत्र और सिद्ध योग में हुआ। जन्म के समय कुंडली में स्थित सूर्य के फलस्वरूप लता आज (Today) गायिका के रूप में विश्वविख्यात हैं।

कुंडली में मंगल की स्थिति ने लता को सुरीला कंठ एवं मधुर आवाज दी। बुध स्वराशि पर विराजमान होने से उन्हें आर्थिक एवं मानसिक सुख प्राप्त हुआ।

लता का जन्म बुध की महादशा में हुआ जिसका भोग्यकाल 15 वर्ष 6 माह 26 दिन रहा। वर्तमान में उनको 24.04.2013 से गुरु की महादशा चल रही है, जो 24.4.2029 तक चलेगी।

उनकी जन्म पत्रिका में लग्नेश शुक्र की राशि में है और शुक्र कला का कारक होने के साथ-साथ गायन से भी संबध रखता है। नवांश कुंडली भी वृषभ की है। वर्गोत्मक नवांश होने से शुक्र का फल उत्तम मिलता है।


उनकी कुंडली में शुक्र चतुर्थ भाव (परिवार भाव) में है, वहीं नवांश कुंडली में तृतीय भाव (स्वर भाव) में चंद्र की राशि कर्क में है। इसी वजह से आपकी आवाज में वह कशिश है जो अन्य गायक कलाकारों में नहीं रही। चंद्र मन का कारक होने के साथ भावनात्मकता से भी जुडा़ रहता है।

कुंडली में गुरु स्वराशि धनु पर विराजमान होने से लता गायन के क्षेत्र में गुरुत्व( सम्माननीय) स्थान पर हैं। परन्तु द्वादश भाव में होने से गुरु घमंडी स्वभाव देता है।

शुक्र आर्थिक सुख देता है। शनि आर्थिक-भौतिक सुख तो प्रदान करता ही है, स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ भी दूर करता है। राहु-केतु स्वास्थ्य की तकलीफ दे सकते हैं।

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार लता जी का चन्द्रमा तृतीय भाव में कर्क राशि में स्थित हैं , जो स्वर भाव के साथ पराक्रम भाव भी है। आपने काफी मेहनत कर उस जमाने की मशहूर सुरैया, नूरजहां, शमशाद बेगम जैसी हस्तियों के बीच रहकर अपनी पहचान बनाई, यह सहज काम नहीं था।

लता जी की नवांश कुण्डली में पंचम भाव (विद्या व मनोरंजन) का स्वामी बुध वर्गोत्मक होने से आप लंबे समय से तक गायन के क्षेत्र में है। चतुर्थ भाव का स्वामी उच्च का सूर्य नवांश में जाकर नीच के शनि के साथ है। यह भी हर प्रकार से लाभदायक रहा।

शनि सूर्य साथ हो तो क्षति नहीं पहुंचाते, आमन- सामने हो तब क्षति का कारण बनते है। शनि जहां कर्मेश है वहीं भाग्येश होकर जन्म लग्न में अष्टम भाव में गुरु की राशि धनु में है, ऐसा योग उत्तम आयु देता है।

लता जी की जन्म पत्रिका में धन भाव का स्वामी बुध उच्च का होकर पंचम (मनोरंजन भाव) में है साथ ही प्रसिद्धि भाव (चतुर्थ/जनता भाव) का भी स्वामी है। यहां सूर्य के साथ होने से जनता के बीच आपकी आवाज आश्चर्यजनक रूप से लोकप्रिय है।

लता जी को लक्ष्मीनारायण योग भी हैं। यही वजह है कि जहां सरस्वती मेहरबान रही, वहीं लक्ष्मीजी की भी कृपा रही।

अंगारक योग एवम मंगल शत्रु राशि में पर भी आपको कोई गंभीर रोग नहीं होगा। नवांश जीवनसाथी के बारे में जाना जाता है, वहां शनि-मंगल का समसप्तक योग बन रहा है।

मंगल सप्तमेश भी है इस कारण विवाह नहीं हुआ। शनि-मंगल जिससे संबंध रखता है उस घर के कारक भाव को नुकसान पहुंचाता ही है।

जन्म कुंडली इन योगों ने लता मंगेशकर को दिलाई कामयाबी


वृषभ लग्न की इनकी कुंडली में लग्न में ही देवगुरु बृहस्पति, तृतीय पराक्रम भाव में कर्क राशिगत चंद्रमा, चतुर्थ सुख भाव में लग्नेश शुक्र एवं पंचम विद्याभाव में सूर्य और बुध बैठे हैं जो बुधादित्य योग भी बना रहे हैं। जबकि छठे शत्रु भाव में केतु और मंगल सप्तम आयु भाव में शनि एवं द्वादश व्यय भाव में राहु बैठे हैं।

बुध ने दी कोयल सी आवाज


लता जी के जीवन में सर्वाधिक प्रभावशाली ग्रह एवं वाणीभाव के कारक बुध का प्रभाव अत्यधिक रहा है। बुध योगकारक सूर्य के साथ पंचम भाव में बैठे हैं, जो शास्त्रों के अनुसार केंद्रभाव के स्वामी होकर त्रिकोणेश के साथ त्रिकोण में ही बैठे हैं और यह युति पंचम विद्या भाव में बनी है। क्योंकि पंचम भाव प्रेम का भी कारक है इसलिए लता ने अपनी वाणी से रोमांटिक गानों को ज्यादा आवाज दी है।

देव गुरु बृहस्पति ने बढ़ाया मान

कुंडली में वृषभ लग्न के सबसे बड़े राजयोग कारक ग्रह शनि अष्टम प्रताप, आयु और यश भाव में बैठे हैं, जिनकी पूर्ण दृष्टि वाणी भाव पर पड़ रही है। फलस्वरूप लता जी ने 12 वर्ष बाद ही प्रोफेशन तौर पर गायन आरंभ कर दिया। गुरुदेव बृहस्पति के लग्न में होने एवं चंद्रमा से एकादश होने के कारण इन्हें कई मानद उपाधियों विभूषित किया गया। इन्हीं सभी शुभ योगों ने इन्हें भारत रत्न भी दिलाया।

जानें विवाह नहीं होने का कारण

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लता जी के जीवन में शनिदेव का प्रभाव सर्वाधिक रहा। पति भाव के स्वामी मंगल मारकेश होते हुए सप्तम भाव से हानि भाव में बैठ गए हैं।

ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार किसी भी जातक की जन्मकुंडली में कोई भी ग्रह किसी भी भाव का स्वामी होकर यदि 6, 8 और 12वें भाव में बैठता है, तो वह जिस भाव का भी स्वामी होता है, उस भाव का फल क्षीण कर देता है।

यहां पर मंगल प्रबल मारकेश भी है पति भाव के स्वामी भी हैं। जिसके परिणाम स्वरूप कुछ संयोग बनते हुए भी विवाह संभव नहीं हो पाया।उनकी जन्मकुंडली में शुक्र ने जन्म लग्न में नीचाभिलाषी होकर दाम्पत्य सुख से वंचित रखा। यह पारिवारिक कारण दर्शाता है।