प्रारंभिक शिक्षा पर दिल्ली, फिनलैंड और जर्मनी की अहम पहल

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नई दिल्ली, 13 जनवरी । बच्चों की प्रारंभिक और औपचारिक शिक्षा पर दिल्ली ने फिनलैंड, जर्मनी के विशेषज्ञों ने एक अहम पहल की है। इस पहल के तहत चार प्रमुख बिंदु तय किए गए। इनमें स्कूली शिक्षा शुरू करने की उम्र, पूर्व-शैक्षणिक और सामाजिक कौशल, सीखने के शुरूआती अंतराल को कम करना, एनईपी की सिफारिश के अनुरूप स्कूलों को तैयार करके मजबूत बुनियाद रखना शामिल है।

दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन में फिनलैंड, जर्मनी और भारत के विशेषज्ञों ने बच्चों को औपचारिक शिक्षा के लिए तैयार करने पर पैनल चर्चा की गई।

सेंटर फॉर अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन एंड डेवलपमेंट, अम्बेडकर विश्वविद्यालय की संस्थापक निदेशक रह चुकी प्रोफेसर विनिता कौल ने कहा कि, नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के आलोक में दिल्ली सरकार को खास तौर पर प्रशिक्षित शिक्षकों का एक कैडर तैयार करके उन्हें स्कूल प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना चाहिए।

इस पैनल चर्चा में डॉ. दिव्या जालान (एक्शन फॉर एबिलिटी डेवलपमेंट एंड इनक्लूजन की संस्थापक सदस्य), सेबेस्टियन सुग्गेट (रेगन्सबर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी में वरिष्ठ व्याख्याता, शिक्षा), तुली मेकिनेन (प्री-स्कूल एजुकेटर, फिनलैंड) ने भी हिस्सा लिया।

इस सत्र की शुरूआत इंग्लैंड की लेखिका लुसी क्रेहन के वक्तव्य से हुई। वह अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा सलाहकार हैं तथा उनकी पुस्तक क्लेवर लैंड्स काफी चर्चित है।

बच्चों की औपचारिक शिक्षा शुरू करने की उपयुक्त उम्र पर तुली मेकिनेन (फिनलैंड) ने कहा कि, फिनलैंड में सात साल की उम्र में बच्चे स्कूल जाने को तैयार किए जाते हैं और वे काफी प्रेरित महसूस कर रहे हैं। वे पढ़ने और सीखने में काफी रुचि दिखाते हैं क्योंकि उन्हें पहले से ही आवश्यक सामाजिक, भावनात्मक कौशल दिए गए हैं। इसलिए हमें लगता है कि यह सही उम्र है और पिछले 50 वर्षो से हम ऐसा ही कर रहे हैं।

दिल्ली सरकार को प्रारंभिक शिक्षा पर सुझाव देते हुए मेकिनेन ने कहा कि शिक्षकों का अच्छा प्रशिक्षण और उन्हें प्रोत्साहित करना उपयोगी होगा।

डॉ. दिव्या जालान ने बच्चों की शिक्षा संबंधी विशेष आवश्यकताओं में अंतराल दूर करने संबंधी सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि, भारत में देखभाल करने वालों और माता-पिता में दिव्यांगता की जानकारी की कमी सबसे बड़ी बाधा है। उन्हें चीजों को स्वीकार करने और काफी समर्थन की आवश्यकता है। लेकिन चीजें बदल रही हैं क्योंकि वे समावेशी स्कूलों और सेवाओं की मांग कर रहे हैं।

सेबेस्टियन सुग्गेट ने कहा कि, भारतीय परिवारों में अक्सर बच्चों को गीत और कहानियां सुनाने की परंपरा है। ऐसे अनुभव बच्चों को काफी प्रेरित करते हैं। उल्लेखनीय है कि श्री सुग्गेट बाल विकास के शोधकर्ता हैं।

–आईएएनएस

जीसीबी/एएनएम