बाइडेन प्रशासन में America-भारत रणनीतिक साझेदारी कामयाब होने की है संभावना

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नई दिल्ली, 14 जनवरी । संभावना है कि 20 जनवरी को जो बाइडेन द्वारा राष्ट्रपति का पद ग्रहण करने के बाद भारत और America के बीच रणनीतिक साझेदारी का ग्राफ ऊपर की ओर चढ़ता रहेगा।

भले ही मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 3 नवंबर 2020 का चुनाव हार गए हैं लेकिन उनके द्वारा बनाया गया विदेश नीति का व्यापक एजेंडा उनके उत्तराधिकारियों द्वारा अपनाया जाएगा, भले ही वे इस पर कम अमल करें या ज्यादा।

बाइडेन के बयानों और उनकी नामित टीम के महत्वपूर्ण सदस्यों — स्टेट सेक्रेटरी एंटनी ब्लिंकन और सीआईए के डायरेक्टर विलियम बर्न्‍स को देखें तो भारत को रणनीतिक रूप से अब भी उतना ही महत्व मिलने की संभावना है, जितनी ट्रंप प्रशासन के दौरान मिली थी।

बाइडेन ने अपने चुनाव अभियान के दौरान बताया था कि भारत-America परमाणु समझौते में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी और पूर्व बराक ओबामा प्रशासन के तहत भारत-America साझेदारी के लिए पूरा समर्थन दिया था। ऐसे में वॉशिंगटन डी.सी. में लंबे करियर के चलते ब्लिंकन भी इससे प्रभावित हुए होंगे। जब बाइडेन ओबामा के उप-राष्ट्रपति थे, उस वक्त ब्लिंकन बाइडेन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे। उन्होंने उसी प्रशासन में राज्य के डिप्टी सेक्रेटरी के तौर पर भी काम किया था।

ब्लिंकन को व्यापक रूप से बाइडेन का करीबी विश्वासपात्र माना जाता है, वे उनके चुनाव अभियान के लिए विदेश नीति सलाहकार भी थे। हडसन इंस्टीट्यूट के साथ बातचीत में, ब्लिंकन ने पिछले साल घोषणा की थी कि बाइडेन एक राष्ट्रपति के रूप में भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने और गहरा करने के लिए बहुत ऊंची प्राथमिकता देंगे।

इसी तरह, फरवरी 2020 में अटलांटिक में एक आर्टिकल में विलियम बर्न्‍स ने इस ²ष्टिकोण का समर्थन करते हुए स्वीकार किया था कि Prime Minister नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में America-भारत रणनीतिक साझेदारी की गति तेज हुई है, जिसने विश्व मंच पर भारत के लिए अधिक आश्वस्त भूमिका निभाई है।

हालांकि Prime Minister मोदी की विदेश नीति टीम द्वारा उन मुद्दों पर बाइडेन प्रेसीडेंसी के साथ बेहतर तरीके से काम न करने के कारण वैसी अभूतपूर्व रियायतें मिलने की संभावना कम हैं, जैसी ट्रंप प्रशासन में मिलीं थीं।

ट्रंप के 4 साल के कार्यकाल में भारत को हमेशा ऊंचा दर्जा मिला। मोदी-ट्रंप के मजबूत व्यक्तिगत संबंध से लेकर भारत-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक सामान्य ²ष्टिकोण तक, America और भारत ने कई मुद्दों पर एक जैसा नजरिया रखा। ट्रंप प्रशासन ने China को लेकर विदेश नीति में निर्णायक बदलाव किया जो एशिया में आक्रामक रूप से फैलता जा रहा था। भारत के मामले में भी यह ऐसा ही था जिसके कारण लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर झड़पें हुईं। ट्रंप ने China पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाकर उसके साम्राज्यवादी विस्तार को नियंत्रित किया। कुल मिलाकर ट्रंप प्रेसीडेंसी की China की सीसीपी के साथ खुली दुश्मनी और भारत के साथ समर्थन के कारण नई दिल्ली ने बीजिंग के तुलना में खुद को मजबूत स्थिति में पाया।

लेकिन बाइडेन और उपराष्ट्रपति-चुनी गई कमला हैरिस ने चुनाव प्रचार के दौरान ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वे भारत में भाजपा सरकार को न केवल धार्मिक और जातिगत अल्पसंख्यकों के अधिकारों बल्कि उनकी भावनाओं के लिए भी जिम्मेदार ठहराएंगे। भारतीय मूल की अमेरिकी हैरिस ने तो अल्पसंख्यकों से संबंधित आंतरिक मामलों पर मोदी सरकार से सवाल भी किए।

गौरतलब है कि विलियम बर्न्‍स ने भारत को मजबूत करने में मोदी की भूमिका को स्वीकार तो किया लेकिन उन्होंने मोदी और ट्रंप दोनों को दुनिया में समस्या का एक हिस्सा बताते हुए कहा कि ये लोकतंत्र को बर्बाद करने में व्यस्त हैं।

जाहिर है कि ये कुछ ऐसे कठिन मुद्दे हैं जिनसे निपटने के लिए भारत को कूटनीति की आवश्यकता होगी।

–आईएएनएस

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