नई दिल्ली, 12 अगस्त । सुप्रीम कोर्ट कोविड-19 महामारी के कथित कुप्रबंधन को लेकर सेवानिवृत्त शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के नेतृत्व में एक आयोग के माध्यम से स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई शुक्रवार को कर सकता है।

सरकार पर कोरोना से निपटने में कुप्रबंधन का आरोप लगाया जा रहा है। इस बाबत छह पूर्व वरिष्ठ नौकरशाहों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने याचिका दायर की है, जिसमें देश के नागरिकों के जीवन और आजीविका पर महामारी के प्रभाव को महत्वपूर्ण बताया गया और एक आयोग का गठन कर इस मामले की जांच कराने की मांग की गई है।

न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ की ओर से शुक्रवार को इस मामले को उठाए जाने की संभावना है। दलील में कहा गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जनवरी के शुरू में अधिसूचित किए जाने के बाद भी भारत में इस बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए केंद्र द्वारा समय पर और प्रभावी उपाय नहीं किए जा सके, इसलिए इस विफलता के संबंध में जांच जरूरी है।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी है कि केंद्र 18 मार्च को उसके द्वारा नियुक्त राष्ट्रीय टास्क फोर्स से परामर्श करने में विफल रहा।

दलील में दावा किया गया कि कोविड-19 महामारी से निपटने के दौरान केंद्र की ओर से होने वाली चूक से लोगों के मौलिक अधिकारों का गंभीर हनन हुआ है।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि राष्ट्रव्यापी बंद लागू होने और इसे लागू करने के तरीके से नौकरियों, आजीविका और समग्र अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है।

याचिका में कहा गया है कि 20 से 39 साल के बीच के लगभग छह करोड़ लोगों ने अप्रैल में ही अपनी नौकरी गंवा दी और चार करोड़ प्रवासी कामगारों की आजीविका अचानक बाधित हो गई।

सरकार द्वारा राष्ट्रव्यापी बंद घोषित किए जाने के फैसले की आलोचना करते हुए दलील दी गई है कि यह फैसला विशेषज्ञों या राज्य सरकारों के साथ उचित परामर्श के बिना ही मनमाने और तर्कहीन तरीके से लिया गया, जो अनुचित है।

याचिका में प्रवासी कामगारों व दिहाड़ी मजदूरों के अपने गृहनगर की ओर पलायन का हवाला दिया गया, साथ ही स्वास्थ्यकर्मियों के संक्रमण से बचाव के लिए पीपीई किट की पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति में देरी पर भी प्रकाश डाला गया है।

–आईएएनएस

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